अन्तर्राष्ट्रीय

ट्रम्प का ‘मोदियाबिंद’ और वैश्विक राजनीति की बदजुबानी

आधारहीन आरोप, एम्प्स्टीन फाइल और भारत के प्रधानमंत्री को बदनाम करने की साज़िश

The Chalta/वैश्विक राजनीति में स्वयं को ‘लालबुझक्कड़’ समझने वाले अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक बार फिर अपनी बेकाबू ज़ुबान के चलते चर्चा में हैं। इस बार निशाने पर हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। ट्रम्प का यह कहना कि वे चाहें तो मोदी का राजनीतिक कैरियर “तबाह” कर सकते हैं, महज़ एक बयान नहीं बल्कि खुली धमकी और अहंकार की पराकाष्ठा है।

इसी कड़ी में कुख्यात एम्प्स्टीन फाइल का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री मोदी को बिना किसी ठोस प्रमाण के घसीटने की कोशिश की जा रही है। यह सवाल स्वाभाविक है कि जब एम्प्स्टीन स्वयं वर्षों पहले जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाया गया, और मामला आज भी न्यायिक प्रक्रिया में है, तो अचानक भारतीय प्रधानमंत्री का नाम इसमें जोड़ने का औचित्य क्या है?

एम्प्स्टीन प्रकरण : आरोपों की आड़ में राजनीतिक षड्यंत्र
एम्प्स्टीन फाइल में जिन वैश्विक हस्तियों पर आरोप लगे, उनमें अमरीकी सत्ता प्रतिष्ठान के कई बड़े नाम शामिल हैं। स्वयं डोनाल्ड ट्रम्प भी लंबे समय से संदेह के घेरे में रहे हैं। ऐसे में यह आशंका बलवती होती है कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और प्रधानमंत्री मोदी की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता से बौखलाकर, एक सोची-समझी साज़िश के तहत उनका नाम इस प्रकरण से जोड़ा जा रहा है।

यह भी याद रखना चाहिए कि अमरीकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रम्प पर अब तक कम से कम 18 महिलाएं यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार के आरोप लगा चुकी हैं। 2016 में सामने आया उनका कुख्यात ऑडियो टेप और पूर्व मॉडल एमी डोरिस के आरोप, ट्रम्प के चरित्र पर पहले से ही गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

मोदी बनाम ट्रम्प : धैर्य बनाम बड़बोलापन
जहां एक ओर ट्रम्प अपनी सनकी, स्त्री-विरोधी और आक्रामक छवि के चलते खुद अपने ही देश में भारी विरोध झेल रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर मोर्चे पर संयम, दूरदर्शिता और राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी है।
चाहे भारत पर ऊंचे टैरिफ थोपने की धमकी हो, ट्रेड डील पर दबाव या भारत-पाक संघर्ष में अमरीकी मध्यस्थता की कोशिश—मोदी सरकार ने हर बार स्पष्ट और आत्मसम्मान से भरा रुख अपनाया। रूस से ऊर्जा आयात, चीन, यूरोप और अरब देशों से मज़बूत व्यापारिक रिश्ते, रूस-यूक्रेन युद्ध में संतुलित कूटनीति और अफगानिस्तान में भारत की सक्रिय भूमिका—इन सभी निर्णयों ने भारत को एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।यही वह आत्मनिर्भर नीति है, जिसने ट्रम्प को भीतर तक असहज किया है।

वैश्विक मंच पर मोदी, कार्टून बनते ट्रम्प
आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री मोदी एक गंभीर, भरोसेमंद और स्थिर नेतृत्व के प्रतीक हैं, जबकि ट्रम्प अपने ही बयानों में उलझकर एक राजनीतिक कार्टून की तरह दिखाई देने लगे हैं। अंततः उन्हें भारत पर लगाया गया बढ़ा हुआ टैरिफ वापस लेना पड़ा—यह स्वीकारोक्ति थी कि दादागिरी अब नहीं चलेगी।

मोदी ने इसके बावजूद उदारता दिखाते हुए अमरीका को मित्र राष्ट्र बताया, लेकिन ट्रम्प की कुंठा यहीं खत्म नहीं हुई। भारत को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ते देखना और स्वयं को अलग-थलग पड़ता महसूस करना, ट्रम्प को असहनीय लग रहा है—और इसी हताशा की उपज है एम्प्स्टीन फाइल की आड़ में की जा रही बदनामी।

देश का सम्मान और प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राजनीतिक भविष्य किसी विदेशी राष्ट्रपति की धमकियों से नहीं, बल्कि भारत की जनता के विश्वास से तय होता है। लगातार तीसरी बार जनादेश प्राप्त करना और विश्व के चुनिंदा नेताओं की श्रेणी में शामिल होना, इस विश्वास का प्रमाण है।
ऐसे समय में, जब विपक्षी दल ट्रम्प के आधारहीन आरोपों को राजनीतिक हथियार बना रहे हैं, देशवासियों को यह समझना होगा कि यह मुद्दा किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि भारत के सम्मान और भविष्य का है।

कहावत है—
“कुत्ता भौंके हज़ार, हाथी चले मस्त चाल।”
प्रधानमंत्री मोदी उसी मस्त चाल से आगे बढ़ रहे हैं, और ट्रम्प की बदजुबानी इतिहास की शोरगुल भरी फुटनोट बनकर रह जाएगी।

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