मूकदर्शक दुनिया और शक्ति की सनक: क्या मानवता सिर्फ़ शब्दों में है?
"कभी आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग, तो कभी लोकतंत्र स्थापित करने की कवायद बताया गया। पर परिणाम? लाखों विस्थापित, टूटी अर्थव्यवस्थाएँ और अस्थिर समाज"

The Chalta/कालम/जब भी विश्व मंच पर कोई बड़ी शक्ति अपनी सैन्य ताक़त का प्रदर्शन करती है, तो आम लोगों के मन में एक ही प्रश्न उठता है—बाकी दुनिया चुप क्यों रहती है? क्या मानवाधिकार, शांति और वैश्विक न्याय सिर्फ़ भाषणों तक सीमित हैं?अक्सर उंगली सीधे संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर उठती है—एक ऐसी महाशक्ति, जिसने बीते दशकों में कई देशों में सैन्य हस्तक्षेप किए। उदाहरण के तौर पर इराक और अफगानिस्तान में हुए युद्ध आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर सवाल खड़े करते हैं। इन हस्तक्षेपों को कभी आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग, तो कभी लोकतंत्र स्थापित करने की कवायद बताया गया। पर परिणाम? लाखों विस्थापित, टूटी अर्थव्यवस्थाएँ और अस्थिर समाज।
अब चर्चा का केंद्र ईरान है। पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति, परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ता तनाव, और प्रतिबंधों की सख़्ती—ये सब मिलकर ऐसा माहौल बना रहे हैं जिसमें आम नागरिक आशंकित हैं कि कहीं एक और देश वैश्विक शक्ति-संतुलन की शतरंज पर मोहरा न बन जाए।
दुनिया मूकदर्शक क्यों?
यह प्रश्न भावनात्मक भी है और यथार्थवादी भी। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था आदर्शवाद से नहीं, बल्कि हितों से चलती है।
कई देश आर्थिक रूप से शक्तिशाली राष्ट्रों पर निर्भर हैं।
वैश्विक संस्थाएँ अक्सर वीटो और कूटनीतिक दबावों में बंधी रहती हैं।
तेल, व्यापार, हथियारों का बाज़ार और रणनीतिक साझेदारियाँ—ये सब “मानवता” से ऊपर प्राथमिकता पा लेते हैं।यह कड़वा सच है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिकता अक्सर ताक़त के सामने कमजोर पड़ जाती है।
मानवता बनाम राष्ट्रीय हित
दुनिया भर में मानवाधिकार की बातें होती हैं, पर जब युद्ध छिड़ता है तो सबसे पहले सच्चाई घायल होती है। किसी भी संघर्ष का सबसे बड़ा बोझ आम जनता उठाती है—बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग। सत्ता के गलियारों में फैसले होते हैं, पर कीमत सीमाओं पर रहने वाले लोग चुकाते हैं।
क्या हर सैन्य कार्रवाई गलत होती है?यह बहस का विषय हो सकता है। पर यह भी सच है कि जब निर्णय एकतरफा लगते हैं और वैश्विक सहमति कमजोर दिखती है, तब अविश्वास बढ़ता है। यही अविश्वास लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं “मानवता” सिर्फ़ कूटनीतिक शब्द तो नहीं?
समाधान क्या?
बहुपक्षीय संवाद को प्राथमिकता – युद्ध नहीं, वार्ता।
वैश्विक संस्थाओं का सशक्तिकरण – ताकि वे निष्पक्ष भूमिका निभा सकें। मीडिया की स्वतंत्रता और पारदर्शिता – ताकि सच्चाई सामने आए। जनमत का दबाव – लोकतांत्रिक देशों में जनता की आवाज़ नीतियों को प्रभावित कर सकती है।
दुनिया मूकदर्शक इसलिए नहीं है कि उसे फर्क नहीं पड़ता, बल्कि इसलिए कि शक्ति-संतुलन की जटिलता उसे खुलकर बोलने से रोक देती है। पर इतिहास गवाह है—अत्यधिक ताक़त का दुरुपयोग स्थायी नहीं होता।
मानवता की असली परीक्षा युद्ध के नारों में नहीं, बल्कि शांति के प्रयासों में होती है। अगर विश्व समुदाय सच में शांति चाहता है, तो उसे सिर्फ़ बयान नहीं, साहसिक और न्यायपूर्ण कदम भी उठाने होंगे।
वरना हर बार कोई न कोई देश “रणनीतिक ज़रूरत” के नाम पर बलि चढ़ता रहेगा—और हम सब सिर्फ़ दर्शक बने रहेंगे।



